पाकिस्तान के ‘कंगारू कोर्ट’ का सच जिसने कुलभूषण को मौत की सजा सुनाई
पाकिस्तान के मिलिट्री कोर्ट को कई देशों में कंगारू कोर्ट कहा जाता है क्योंकि यहां ना कोई वकील होता है, ना कोई दलील होती है।
पाकिस्तान के मिलिट्री कोर्ट को कई देशों में कंगारू कोर्ट कहा जाता है क्योंकि यहां ना कोई वकील होता है, ना कोई दलील होती है।
पाकिस्तान की अदालत ने नहीं पाकिस्तान की मिलिट्री कोर्ट ने कुलभूषण को फांसी पर लटकाने की सजा सुनाई। भारत इस मिलिट्री कोर्ट के फैसले को चुनौती दे रहा है। दरअसल पाकिस्तान के मिलिट्री कोर्ट का मजाक उड़ाया जाता है। दुनिया के कई देशों में इसे कंगारू कोर्ट कहा जाता है क्योंकि यहां ना कोई वकील होता है, ना कोई दलील होती है।
जब पाकिस्तान में मौजूद सूत्रों से बात की गई तो पता चला कि पाकिस्तान की मिलिट्री कोर्ट के जज कानून की एबीसी भी नहीं जानते। उनके पास कानून की कोई डिग्री नहीं होती है। शुरू में तो आरोपी खुद वकील भी नहीं रख सकता था। परिवारवाले भी आरोपी से नहीं मिल सकते। सेना के प्रवक्ता के जरिए ही बात हो सकती है। मुकदमा कब चला, कहां चला। सुनवाई कब शुरू हुई और कब खत्म हो गई, समय तक नहीं बताया जाता है। आरोपी के परिवार वालों को ये भी नहीं बताया जाता कि उसे कहां रखा गया है। फैसला सुना दिए जाने के कई दिन बाद तक उस फैसले की खबर परिवारवालों को नहीं दी जाती है।
ये दुनिया की इकलौती कोर्ट होगी जहां 100 में से 90 आरोपी खुद अपना गुनाह कबूल कर लेते हैं। फरवरी महीने तक 140 में से 135 आरोपियों ने खुद ही इकबालिया बयान दिया और गुनाह कबूल कर लिया और उन्हें मिलिट्री कोर्ट ने सजा सुना दी। अंदर की बात ये है कि पाकिस्तान की आर्मी इस कदर टॉर्चर करती है कि आरोपी ज़िंदगी से नफरत करने लगता है। टॉर्चर से परेशान होकर वो टूट जाता है और फिर आर्मी जो कहती है वो कबूल कर लेता है। इस कबूलनामे के आधार पर मिलिट्री कोर्ट फैसला सुना देती है। ये मिलिट्री कोर्ट आतंकवादियों को सजा देने के लिए बनी थी। लेकिन उन लोगों को सजा दी जा रही है जो आर्मी के खिलाफ मुंह खोलते हैं। दो साल में 274 मामले सामने आए हैं जिसमें 161 को फांसी की सजा सुना दी गई है।



