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मायावती का राज्यसभा से इस्तीफा राजनीतिक हाशिए से लौटने का एक तरीका ज्यादा लगता है

मायावती ने एक रिस्क लिया है जिसमें उनके पास खोने के लिए सिर्फ दस महीने की सांसदी है।

Mayawati quits Rajya Sabha: Decision is a last-ditch effort to resurrect her failing political career आज की रिपोर्ट बड़ी ख़बरें 

मायावती ने एक रिस्क लिया है जिसमें उनके पास खोने के लिए सिर्फ दस महीने की सांसदी है।

मायावती ने मंगलवार को राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया । मायावती को सहारनपुर दंगे पर  अपनी बात रखने के लिए 3 मिनट का निर्धारित समय दिया गया । समय पूरा होने पर राज्यसभा के उपसभापति ने मायावती को रोका परन्तु मायावती आपा खो बैठीं। उन्होंने तैश में उपसभापति पर जमकर बरसते हुए कहा-” मुझे मेरी बात करने दो । अगर आप मुझे बोलने नहीं दोगे तो मुझे इस सदन में रहने का कोई हक नहीं है । मायवती ने आगे कहा की अगर उन्हें बोलने नहीं दिया गया तो वे अभी  इस्तीफा दे देंगी ।मायावती ने कहा की अगर वे अपने  समाज की बात नहीं रख सकती तो उन्हें सदन में रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है । मैं अभी सदन से इस्तीफा देती हूँ , ऐसा कह कर मायावती सदन को छोड़ कर चली गयी ।”


जिसके बाद सदन कार्य राज्यमंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि मायावती ने उपसभापति का अपमान किया है, जिसके लिए उन्हें माफी मांगनी चाहिए।

मायावती का इस्तीफा,  दलित वोट बैंक हासिल करने का मास्टरस्ट्रोक? 


मायावती का राज्यसभा का कार्यकाल अगले साल अप्रैल में खत्म  हो रहा हैं । सिर्फ 10 महीने पहले मायावती का इस्तीफा देना राजनीतिक जानकारो  को पच नहीं रहा है । उत्तर प्रदेश में अभी  मायावती के सिर्फ 19 विधायक है इसलिए उनका राज्यसभा में वापस आना भी संदेहास्पद लग रहा था । लालू यादव ने जिस तरह से मायावती के इस्तीफे के बाद उन्हें  बिहार से राज्यसभा  भेजने की बात की पेशकश की इस से मायवती को अपना इस्तीफे का  दांव सही लग  रहा होगा ।

एनडीए के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद उत्तरप्रदेश के दलित समुदाय से आते हैं, लेकिन मायवती ने उऩका समर्थन नहीं किया है। अब उन्हें डर लग रहा है कि कहीं उत्तरप्रदेश के दलित उनसे और दूरी ना बना ले और भाजपा का दामन हमेशा के लिए थाम ले  ।


मायावती को पता है की अगर उनकी पार्टी 2019 का चुनाव अखिलेश यादव के साथ मिल कर लड़ी तो उनकी पार्टी का लोकसभा में खाता खुल सकता है जो अभी शून्य पर अटका है। वोट बैंक के नाम पर अब उनके पास सिर्फ दलित वर्ग के भी एक खास समुदाय का वोट है। अगर माया ने अपना वोट बैंक नहीं बढाया तो 2019 तक उनकी पूरी सियासत खत्म हो सकती है।  इसलिए उन्होंने एक रिस्क लिया है जिसमें उनके पास खोने के लिए सिर्फ दस महीने की  सांसदी है।

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