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मोहनी की ज़िंदगी समाज की एक कड़वी सच्चाई पर प्रश्न खड़ा करती है

जहां तक मोहनी की बात है तो उसे गांववाले चंदु की पत्नी के नाम से जानते है । मोहनी को याद भी नहीं की उसे उसके नाम से अंतिम बार कब बुलाया गया था ।

आज की रिपोर्ट पाठकों की तरफ से 

यह कहानी है मोहनी और उसके पति चंदु की । मोहनी को याद भी नहीं की कब उसकी शादी चंदु से हुई लेकिन दोनों को एक साथ रहते हुए 45 साल गुजर गए । इन सालो में गांव में काफी तरक्की हो चुकी है । यहां अस्पताल ,स्कूल ,थाना ,तहसील और कई अन्य महत्वपूर्ण कार्यालय खुल चुके है । इन सालों में एक चीज़ नहीं बदली ,वह है मोहनी की जिंदगी ।

मोहनी 45 सालों से हर दिन सूर्योदय से पहले उठ जाती है और घर का काम-काज खत्म कर अपने पति का साथ देने उसकी  चाय की दुकान पर साथ जाती है । सुबह से शाम तक वह अपने पति के साथ काम में डटी रहती है । उसके पास किसी से बातचीत करने तक की फुर्सत नहीं है । मोहनी की पूरे गांव में कोई सहेली भी नहीं है । होती भी कैसे ,चाय की दुकान पर गांव की औरतें आती नहीं और मोहनी के पास तो पढ़ोसी के घर आने जाने तक का समय नहीं है । रात को थकी-हारी मोहनी घर आकर खाना बनाती है । चंदु खाना खा कर सो जाता है और मोहनी घर से अन्य कामों में व्यस्त हो जाती है । मोहनी जिसने अपनी सारी उम्र चंदु के साथ गुजार दी उसने कभी कोई सुख जैसे देखा ही नहीं । यही उसकी सबसे बड़ी ताकत भी है । उसे शायद एहसास भी नहीं है की ख़ुशी होती किया है ।

 

गांव में चंदु की तारीफ़ करने वाले आपको सैकड़ो मिल जाएंगे । मिले भी क्यों नहीं , चंदु गांववालों को तो छोड़िये अनजानों की मदद करने में भी सबसे आगे रहता है । वह सबके सुख दुःख में शरीक होता है और सभी चन्दू की इस उदारता व मिलनसार स्वाभाव की तारीफ करते नहीं थकते ।

जहां तक मोहनी की बात है तो उसे गांववाले चंदु की पत्नी के नाम से जानते है । मोहनी को याद भी नहीं की उसे उसके नाम से अंतिम बार कब बुलाया गया था । दिन में चाय सही ना बनने पर चंदु की दो -चार तेज फटकार उसे यह याद जरूर याद दिला देती है कि उसके आस पास एक इंसान तो है । चंदु ने मोहनी की कोई ख्वाहिश पूरी नहीं की और ना ही मोहनी ने कभी अपनी कोई ख्वाहिश चंदु के सामने जाहिर की । मोहनी अपने जिंदगी की इस दायरे में खुश है लेकिन वह चाहती है उसका पति उससे बात करे जैसे वह दूसरों से करता है । दिन में एक बार उससे उसका हाल पूछ ले जैसे वह दुकान पर आए हर इंसान से पूछता है । एक प्रश्न उसे हमेशा कटोचता है सब से अच्छा व्यबहार करने वाला चंदु उसके साथ पत्नी ना सही एक आम इंसान के तरह भी क्यों पेश नहीं आता ।

सवाल यह उठना लाज़मी है की अगर चंदु अच्छा है तो वह मोहनी की मनोदशा क्यों नही समझता ? आप उस व्यक्ति को क्या कहेंगे जो अपने परिवारवालों का सम्मान नहीं करता लेकिन बाहरवालों के बीच नायक बना बैठा हो ? ऐसे लोगों को देख कर लगता है की जिंदगी एक छलावा है जहां हर किसी ने अपने चेहरे के उपर एक मुखोटा पहन रखा है । हर कोई बहरूपिया है । इंसान अपने और अपने परिवार की  ख़ुशी की कुर्बानी समाज के सामने अच्छा दिखने के लिए देता है । शायद इस किस्म के इंसान बहुत चलाक होते है उन्हें पता है की उनके अपने उनका साथ नही छोड़ेंगे और समाज में इज्ज़त उन्हें तभी मिलेगी जब तक उनके चेहरे पर मुखोटा है ।

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